धर्मानुमोदित विवाह

 💐  धर्मानुमोदित विवाह  💐


धर्मशास्त्र के अनुसार आठ प्रकार के विवाह होते हैं।ये हैं-

१- ब्राह्म २- दैव ३- आर्ष ४- प्राजापत्य ५- आसुर ६-

गान्धर्व ७- राक्षस और ८-पैशाच ।इनमें से आरम्भ के चार

धर्मानुमोदित विवाह की कोटि में आते हैं और चार अधर्म और पाप की कोटिमें आते हैं।इस प्रकारसे धर्मऔर अधर्म विवाह की उत्कृष्टता और अपकृष्टता का मापदण्ड स्वयं शास्त्र तय करता है। उत्कृष्टता को मापने का मानदण्ड इस बात पर निर्भर करता हैकि किस विवाहसे कितनी पीढ़ियाँ तरती हैं?

💐ब्राह्मविवाह करनेसे २१पीढ़ियाँ तरतीहैं--पुनात्युभयतः पुरुषान् एकविंशतिम्।याज्ञवल्क्य--१/५८  ।।ब्राह्म विवाह में वर को घर बुलाकर पूजित कर कन्या दी जाती है।

💐 दैव विवाह में यज्ञ करने वाले (ऋत्विक) आचार्य को कन्या दी जाती है।यह विवाह चौदह पीढियों को तारता है -- चतुर्दश प्रथमज: ।

💐 आर्ष विवाह में कन्या का पिता दो गायों को लेकर धर्मार्थं अपनी कन्या का विवाह करता है।यह विवाह छः पीढ़ियों को तारता है--उत्तरजश्च षट्।

💐 प्राजापत्य विवाह में कन्या का पिता वर को बुला कर कहता है-- तुम दोनों साथ साथ धर्म करने के लिए विवाह करो।ऐसा आज्ञापित कर कन्यादान करने से तेरह पीढ़ियाँ तरती हैं।

इस प्रकार से श्रेष्ठता क्रम में ब्राह्म,दैव, प्राजापत्य और आर्ष विवाह आते हैं।आर्ष विवाह में गोयुग्म दान में लेने के कारण यह धर्मानुमोदित अवर विवाह में आता है।आज प्राजापत्य विवाह की विवशता यह है कि कोई भी माता पिता दोनों को बुला कर यह आज्ञापित नहीं करता कि जाओ ,साथ साथ धर्म करो। आज कहा जाता है--"आनंद लो,सुख पूर्वक रहो।"" ऐसा कहते ही विवाह धर्म कोटि से च्युत हो जाता है।अतः आज ब्राह्म विवाह ही प्रचलन में है जिसे अरेंज मैरेज कहा जा रहा है। 

अरेंज मैरेज शब्द बहुत हल्का और धर्म वैशिष्ट्य से रहित होने का आभास कराता है।

💐💐--- अन्य चार प्रकार के विवाह में तीन पाप पूर्ण ( आसुर,राक्षस और पैशाच ) विवाह हैंऔर एक (गान्धर्व) में धर्म की प्रधानता न होकर साहचर्यजनित लगाव- जिसे आज प्रेम कहा जाता है- की प्रधानता होती है जो समय की आंधी में उखड़ जा रहा है।

फिरभी गान्धर्व विवाहकी सबसे बड़ी विशेषता हैकि इसमें

वर कन्या परस्पर एक दूसरे पर अटूट विश्वास करतेहैं।जब

यह विश्वास टूटता है तब दोनोंके बीच कोई साक्षी या मध्य वाला नहीं बचता है जो मेल मिलाप करा सके।महाकवि कालिदास गान्धर्व विवाह के सन्दर्भ में सुझाव देते हैं कि कन्या को वर की परीक्षा लेकर तब विवाह हेतु हाँ कहना चाहिए--अतः परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात् संहतिरहः।एकांत में जब दो युवा का मिलन हो तब कन्या को अपने स्तर पर पूर्ण आश्वस्त हो लेना चाहिए कि यह व्यक्ति कुलीनहै।मेरा साथ नहीं छोड़ेगा। आज जो गान्धर्व विवाह ( लव मैरेज ) हो रहे हैं उनमें कन्या और वर के बीच में स्थापित विश्वास एक झटके में टूट जा रहा है।अथवा दोनों ही विवाह के पश्चात् माता पिता का परित्याग कर अपनी दुनिया अलग कर ले रहे हैं। ऐसे में पितृ पालन धर्म का नाश होनेसे शाप

या पाप का भाग दोनों को मिल रहा है।

** गान्धर्व विवाह के भीतर भी वर कन्या के बीच धर्म का एक शपथ जन्य संकल्प होना चाहिए-- हम दोनों आजन्म साथ रहते हुए धर्म-अर्थ के साथ काम की पूर्ति करने का संकल्प लेते हैं। **

💐-अधर्मानुमोदित विवाह के सन्दर्भ में भी गिरावट की गहराई को आचार्यों ने मापा है।कन्या को बेचना आसुर विवाह कहलाता है।इसमें कन्या के पिता को अपयश और

अधर्म की प्राप्ति होती है-- आसुरो द्रविडादानात्।बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में नाटकों के माध्यम से कन्या विक्रय रूपी आसुर कर्म का निवारण किया जाता रहा है।प्रायशः

धन लेकर लड़की खरीदकर लोग बूढ़े से कन्या का विवाह कर देते थे। " नन्हों " कहानी और " बेटी बेचवा " नाटक इस दिशा में ख्यात रहे हैं।

💐- राक्षस विवाह में कन्या का युद्ध करके या अपहरण करके विवाह किया जाता है।इसमें कन्या का भाव पक्ष मर जाता है और बचा रहता है केवल शरीर का लोथड़ा।वह आत्म हत्या करे या अनचाहे पुरुष के क्षुब्ध वीर्य से उत्पन्न संतान की जननी बने।इसके उदाहरण इतिहास में भी हैं और आज का विश्व भी इससे अछूता नहीं है।

💐- पैशाच विवाह सर्वथा निकृष्ट और पतित विवाह है।इसमें कन्या के साथ छल करके उसके स्त्रीत्व को आहत किया जाता है। मूर्छित करके, परिचय छुपा करके,उसे चक्रव्यूह में फंसा करके केवल उसे नष्ट करना उद्देश्य होता है।फिर भी इसे विवाह कहा जाता है क्योंकि उसका प्रथम पति छल से उसे अमर्यादित ढंग से प्राप्त करता है।पैशाच विवाह का दण्ड अलग अलग जगहों पर अलग अलग होता है।इसमें मृत्यु दण्ड भी दिया जा सकता है।पैशाच विवाह केवल कन्या के साथ ही पाप कर्म को सूचित नहीं करता बल्कि यह किसी सभ्यता और संस्कृति के विरुद्ध छद्म युद्ध होता है।

निकृष्ट कोटि के विवाहों के लिए समाज दण्ड भोगता है और इसमें स्त्री सर्वाधिक दंडित होती है।ऐसे विवाहों के लिए दण्ड के चयन का विधान होता है।अतः शास्त्र भी विधान केवल श्रेष्ठ विवाह हेतु बनाता है।

गृह्य सूत्रों में विवाह को सार्वकालिक कहा गया है।धर्मानुमोदित विवाह में श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मास वर्जित होते हैं।अन्य चारो के लिए समय की कोई वर्जना नहीं है।मेरे पास बहुत पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक अभिमत मांगा गया था कि अगस्त मास में विवाह हो सकता है कि नहीं? मैंने कहा -- विवाह:सार्वकालिक: आदेश के अनुसार धर्म अनुबन्ध रहित विवाह किसी भी मास और समय में हो सकता है। कोर्ट ने इसे मानते हुए उस विवाह को सही माना था।

💐-विश्व के प्रायः सभी देशों में विवाह को धर्म उत्पत्ति का कारक न मान कर उसे किसी वैधानिक संस्था द्वारा विधि सम्मत बनाया जाता है। धर्म विवाह द्वारा धर्म प्रधान संतति उत्पन्न करना केवल ऋषि पद्धति के द्वारा ही सम्भव है जिसेआज विधर्मी औरउनके समर्थक लव मैरेज

की तुलना में हेय प्रचारित करते हैं।

💐- प्राचीनकाल में गृह्य सूत्रों द्वारा सीधे विवाह कराया जाता था। १२५० ईसवी के आस पास शुक्ल यजुर्वेद के पारस्कर गृह्य सूत्र पर आचार्य हरिहर ने पद्धति लिखी।बाद में गदाधर आचार्य ने इसे और अधिक वैकल्पिक बना कर स्थान भेद से उत्पन्न मतभेद को मान्यता दी।

विवाह के संदर्भ में सभी ऋषियों का मत है कि विवाह को पूर्णतः न तो नियंत्रित किया जा सकता है न ही इसे एक ही पद्धति के अनुसार चलाया जा सकता है।मन्त्र सभी के एक हैं पर प्रक्रिया में भेद अनेनानेक जगहों पर है।

  💐--  एक और प्रकार का विवाह विश्व में प्रचलित है जिसमें वर कन्या धर्म पूर्वक सहैव रहते हैं पर उन्हें विवाह को धर्म मय बनाने का तरीका नहीं मालूम है। ऐसे अनजान विधि युग्म के लिए हम सनातनी व्यवस्था दे सकते हैं कि वे अपने विवाह को अपनी ही भाषा में धर्म के गहन अर्थ से जोड़ सकें।

जिन्हें अपनी जड़ हीन चीजें प्रिय होती हैं वे दूसरों की जड़ों को खोदने का पूर्ण प्रयास करते हैं।यही कारण है आज अनेक शक्तियां हिन्दुओं की विवाह संस्था को तोड़ने की शिक्षा दे रही हैं ?

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