बाणों की मृत्यु शैया पर पड़े पितामह भीष्म ने कहा
बाणों की मृत्यु शैया पर पड़े पितामह भीष्म ने कहा- "कुछ पूछूँ केशव ?
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " तो ठीक . !!
श्रीकृष्ण बोले - कहिये न पितामह !
भीष्म बोले- "एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या ?"
श्रीकृष्ण - "किसकी ओर से पितामह ?
भीष्म पितामह - पांडवों की ओर से ?"
"कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया ! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था ?
आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ और द्रोणाचार्य के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या ? यह सब उचित था क्या ?
श्रीकृष्ण - कुछ बुरा नहीं हुआ, कुछ अनैतिक नहीं हुआ !
वही हुआ जो हो होना चाहिए था
भिष्म पितामह - "यह तुम कह रहे हो केशव ?
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का अवतार श्रीकृष्ण कह रहा है ?
यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे हो गया केशव ?
श्रीकृष्ण - इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है !
"हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है !!"
"राम त्रेता युग के नायक थे, मेरे भाग में द्वापर आया !
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह !!"
"राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह !
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था !!
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण, मंदोदरी, माल्यावान जैसे सन्त हुआ करते थे ...
तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे ...
उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था .... !!
क्या रावण ने सीताजी को अपनी जंघा पर बिठाने का प्रयास किया था ?
क्या भरी सभा में किसी स्त्री को निर्वस्त्र करने का प्रयास किया गया था ?
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया ... !
किंतु मेरे युग के भाग में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं ... उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह .... !
पाप का अंत आवश्यक है पितामह, वह चाहे जिस विधि से हो .... !!"
" भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह .... !
कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा पितामह .... !
वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा ...! नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा .... !
जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह .... !
तब महत्वपूर्ण होती है धर्म की विजय , केवल धर्म की विजय .... !
भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह* ...
"सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह .... !
ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ... केवल मार्ग दर्शन कराता है,
मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है .... !
आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न ! ... तो बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस महाभारत युद्घ में कुछ किया क्या ? ... सब पांडवों को ही करना पड़ा न .... ?
युद्ध के प्रथम दिन से ही यही तो कहा था मैंने अर्जुन से कि उठाओ गांडीव युद्ध करो... युद्ध ! यही परम सत्य है ...
जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ...
धर्मों रक्षति रक्षितः
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