नींव ही कमजोर पड़ रही है गृहस्थी की..!!

 सभी से अनुरोध है कि एक बार पढ़ियेगा अवश्य । काफी समय के बाद किसी ने बेहद सुंदर आर्टिकल भेजा है ।


🙏🏽 


*नींव ही कमजोर पड़ रही है गृहस्थी की..!!* 



आज हर दिन किसी न किसी का घर खराब हो रहा है ।

*इसके मूल कारण और जड़ पर कोई नहीं जा रहा है, जो कि अति संभव है एवं निम्न हैं----------------।



*1, पीहरवालों की अनावश्यक  दखलंदाज़ी।*


*2, संस्कार विहीन शिक्षा*


*3, आपसी तालमेल का अभाव* 


*4, ज़ुबानदराज़ी*


*5, सहनशक्ति की कमी*


*6, आधुनिकता का आडम्बर*


*7, समाज का भय न होना*


*8, घमंड झूठे ज्ञान का*


*9, अपनों से अधिक गैरों की राय*


*10, परिवार से कटना।*


 *11.  घण्टों मोबाइल पर चिपके रहना ,और घर गृहस्थी की तरफ ध्यान न देना।* 


*12. अहंकार के वशीभूत होना ।* 


पहले भी तो परिवार होता था,

*और वो भी बड़ा।*

*लेकिन वर्षों आपस में निभती थी!*

*भय था , प्रेम था और रिश्तों की मर्यादित जवाबदेही भी।*

*पहले माँ बाप ये कहते थे कि मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष है*, 


*और अब कहते हैं कि मेरी बेटी नाज़ों से पली है । आज तक हमने तिनका भी नहीं उठवाया।*


*तो फिर करेगी क्या शादी के बाद ?*




*शिक्षा के घमँड में बेटी को आदरभाव,अच्छी बातें,घर के कामकाज सिखाना और परिवार चलाने के सँस्कार नहीं देते।*


*माँएं खुद की रसोई से ज्यादा बेटी के घर में क्या बना इसपर ध्यान देती हैं।*


*भले ही खुद के घर में रसोई में सब्जी जल रही है ।*


*मोबाईल तो है ही रात दिन बात करने के लिए।*


परिवार के लिये किसी के पास समय नहीं।


*या तो TV या फिर पड़ोसन से एक दूसरे की बुराई या फिर दूसरे के घरों में तांक-झांक।*


जितने सदस्य उतने मोबाईल।

*बस लगे रहो।*


बुज़ुर्गों को तो बोझ समझते हैं।

*पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन तक नहीं कर सकता।*

सब अपने कमरे में।


*वो भी मोबाईल पर।*



बड़े घरों का हाल तो और भी खराब है।

*कुत्ते बिल्ली के लिये समय है।*

*परिवार के लिये नहीं*।




*सबसे ज्यादा बदलाव तो इन दिनों महिलाओं में आया है।*


*दिन भर मनोरँजन,* 


*मोबाईल,*


*स्कूटी..कार पर घूमना फिरना ,*


*समय बचे तो बाज़ार जाकर शॉपिंग करना*


*और ब्यूटी पार्लर।*


जहां घंटों लाईन भले ही लगानी पड़े ।


भोजन बनाने या परिवार के लिये समय नहीं।


*होटल रोज़ नये-नये खुल रहे हैं।*

जिसमें स्वाद के नाम पर कचरा बिक रहा है।


*और साथ ही बिक रही है बीमारी एवं फैल रही है घर में अशांति।*


आधुनिकता तो होटलबाज़ी में है।

*बुज़ुर्ग तो हैं ही घर में बतौर चौकीदार।*







*माँ बाप बच्ची को शिक्षा तो बहुत दे रहे हैं ,

*लेकिन उस शिक्षा के पीछे की सोच ?*

ये सोच नहीं है कि परिवार को शिक्षित करें।

*बल्कि दिमाग में ये है कि कहीं तलाक-वलाक हो जाये तो अपने पाँव पर खड़ी हो जाये*

*ख़ुद कमा खा ले।*

*जब ऐसी अनिष्ट सोच और आशंका पहले ही दिमाग में हो तो रिज़ल्ट तो वही सामने आना ही है।*



 साइँस ये कहता है कि गर्भवती महिला अगर कमरे में सुन्दर शिशु की तस्वीर टांग ले तो शिशु भी सुन्दर और हृष्ट-पुष्ट होगा।

*मतलब हमारी सोच का रिश्ता भविष्य से है।*



बस यही सोच कि - अकेले भी जिंदगी जी लेगी गलत है ।

*संतान सभी को प्रिय है।*

लेकिन ऐसे लाड़ प्यार में हम उसका जीवन खराब कर रहे हैं।



*पहले पुराने समय में , स्त्री तो  छोड़ो पुरुष भी थाने, कोर्ट कचहरी जाने से घबराते थे।*

*और शर्म भी करते थे।*

*लेकिन अब तो फैशन हो गया है।*

पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ *तलाकनामा* तो जेब में लेकर घूमते हैं।



*पहले समाज के चार लोगों की राय मानी जाती थी।*

*और अब तो समाज की कौन कहे , माँ बाप तक को जूते की नोंक पर रखते हैं।*



*सबसे खतरनाक है - ज़ुबान और भाषा,जिस पर अब कोई नियंत्रण नहीं रखना चाहता।*

कभी-कभी न चाहते हुए भी चुप रहकर घर को बिगड़ने से बचाया जा सकता है।

*लेकिन चुप रहना कमज़ोरी समझा जाता है।*आखिर शिक्षित जो हैं।

*और हम किसी से कम नहीं वाली सोच जो विरासत में मिली है।*



*

*गोली से बड़ा घाव बोली का होता है।*



*आज समाज ,सरकार व सभी चैनल केवल महिलाओं के हित की बात करते हैं।*



*पुरुष जैसे अत्याचारी और नरभक्षी हों।*

*बेटा भी तो पुरुष ही है।*

*एक अच्छा पति भी तो पुरुष ही है।*

*जो खुद सुबह से शाम तक दौड़ता है, परिवार की खुशहाली के लिये।*

*खुद के पास भले ही पहनने के कपड़े न हों।*

*घरवाली के लिये हार के सपने ज़रूर देखता है।*

बच्चों को महँगी शिक्षा देता है।



*मैं मानता हूँ पहले नारी अबला थी।*

माँ बाप से एक चिठ्ठी को मोहताज़।

*और बड़े परिवार के काम का बोझ।*



अब ऐसा है क्या ?

*सारी आज़ादी।*


मनोरंजन हेतु TV,


*कपड़े धोने के लिए वाशिंग मशीन,* 


*मसाला पीसने के लिए मिक्सी*, 


*रेडिमेड  पैक्ड आटा,


*पैसे हैं तो नौकर-चाकर,*


*घूमने को स्कूटी या कार* 


*फिर भी और आज़ादी चाहिये।*


आखिर ये मृगतृष्णा का अंत कब और कैसे होगा ?


*घर में कोई काम ही नहीं बचा।*


दो लोगों का परिवार।


*उस पर भी ताना।।*

कि रात दिन काम कर रही हूं।



*ब्यूटी पार्लर आधे घंटे जाना आधे घंटे आना और एक घंटे सजना नहीं अखरता।*



लेकिन दो रोटी बनाना अखर जाता है।


*कोई कुछ बोला तो क्यों बोला ?*


*बस यही सब वजह है घर बिगड़ने की।*

खुद की जगह घर को सजाने में ध्यान दें , तो ये सब न हो।


*समय होकर भी समय कम है परिवार के लिये।*


ऐसे में परिवार तो टूटेंगे ही।



*पहले की हवेलियां सैकड़ों बरसों से खड़ी हैं।*और पुराने रिश्ते भी।


 मजबूत घर कुछ दिनों में ही धराशायी।*


और रिश्ते भी महीनों में खत्म।



*इसका कारण है

रिश्तों  मे *ग़लत सँस्कार*

*खैर हम तो जी लिये।*



सोचे आनेवाली पीढी।

*घर चाहिये या दिखावे की आज़ादी ?*



दिनभर बाहर घूमने के बाद रात तो घर में ही महफूज़ होती है ।

आप मानो या ना मानो आप की मर्जी मगर यह सत्य है ।

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